Lokesh Singh Pawar
Mai Aur Meri Parchai
Mai Aur Meri Parchai
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कुछ किताबें कहानियाँ सुनाने के लिए नहीं लिखी जातीं।
वे किसी शोर को शांत करने के लिए, किसी भीतर की उलझन को थामने के लिए, या फिर उस परछाई से संवाद करने के लिए लिखी जाती हैं, जिसे हम रोज़ अपने साथ लेकर चलते हैं—लेकिन कभी ठीक से देखते नहीं।
“मैं और मेरी परछाई” ऐसी ही एक रचना है।
यह पुस्तक किसी एक घटना, किसी बड़े मोड़ या किसी तयशुदा निष्कर्ष की कहानी नहीं है। यह उस मन की कथा है जो रोज़ दुनिया के सामने सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर लगातार सवालों, स्मृतियों, थकान और आत्मसंवाद से जूझता रहता है। यह किताब रिश्तों की परिभाषा नहीं गढ़ती, न ही जीवन के लिए कोई सूत्र देती है। यह बस उस अनुभव को शब्द देती है, जिसे हम अक्सर “ठीक हूँ” कहकर टाल देते हैं।
इस पुस्तक में लेखक अपने ही भीतर उतरता है—
डर, असमंजस, अकेलापन, उम्मीद, टूटन और फिर खुद से समझौता…
सब कुछ बहुत चुपचाप, बिना किसी घोषणा के सामने आता है। यहाँ परछाई केवल एक प्रतीक नहीं है, बल्कि वह साथी है जो हर मोड़ पर साथ चलती है—कभी सवाल बनकर, कभी आईना बनकर, और कभी बोझ बनकर।
“मैं और मेरी परछाई” आधुनिक जीवन के उस सच को छूती है, जहाँ इंसान भीड़ में घिरा है, लेकिन भीतर से अकेला है। जहाँ लक्ष्य हैं, जिम्मेदारियाँ हैं, अपेक्षाएँ हैं—लेकिन उनके बीच खुद के लिए जगह बहुत कम बचती है। यह किताब उस क्षण को पकड़ती है, जब इंसान रुककर खुद से पूछता है:
“क्या मैं वही जी रहा हूँ, जो मैं होना चाहता था?”
भाषा बेहद सहज, संवेदनशील और आत्मीय है। कहीं-कहीं यह गद्य होते हुए भी कविता-सी लगती है, और कहीं एक सीधी बातचीत की तरह—जैसे कोई आपको सामने बैठकर अपनी बात कह रहा हो, बिना किसी बनावट के। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह किताब पढ़ी नहीं जाती, महसूस की जाती है।
यह रचना न तो आत्मकथा होने का दावा करती है, न ही किसी और की कहानी होने का। यह उन तमाम पाठकों की हो जाती है, जो कभी अकेले बैठे अपने ही ख्यालों से डर गए हों, जिन्होंने भीड़ में खुद को खोया हो, या जिन्होंने अपने भीतर की आवाज़ को बार-बार अनसुना किया हो।
यहाँ प्रेम भी है, लेकिन वह किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं है—
वह जीवन से, स्मृतियों से, किताबों से, और खुद से जुड़ा हुआ प्रेम है।
यहाँ दर्द भी है, लेकिन वह शिकायत नहीं करता—बस मौजूद रहता है।
और यहाँ उम्मीद भी है, लेकिन बहुत शांत रूप में—किसी बड़े वादे की तरह नहीं, बल्कि एक धीमी साँस की तरह।
“मैं और मेरी परछाई” उन पाठकों के लिए है जो तेज़ कहानी नहीं, गहराई चाहते हैं।
जो सवालों से डरते नहीं, बल्कि उन्हें अपने साथ बैठने देते हैं।
जो यह मानते हैं कि हर जवाब तुरंत नहीं मिलता—और कभी-कभी न मिलना भी ठीक है।
यह किताब आपको खुद से मिलने के लिए मजबूर नहीं करती,
लेकिन अगर आप चाहें, तो यह चुपचाप आपके साथ चल सकती है।
और अगर किसी पन्ने पर, किसी पंक्ति में, आपको अपनी ही परछाई झलक जाए—
तो समझिए, यह किताब सिर्फ़ लेखक की नहीं रही।
वह अब आपकी भी है।
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